Accidental Fall down

Accidental Fall down

Accidental fall down means that you’re yourself somewhere, out there doing sankirtan or whatever activity you’re doing and you get attracted to drink say, coca cola and somebody offers you and you say, “Okay, I’m all by myself and here is a person and I see Krishna through this person who is bringing me coca cola, so I cannot drink but let me, it’s just a little thing not much so let me drink.” So, it is an accidental fall down. But, not knowingly you can fall down that let me have gross sense gratification, illicit sex, gambling, meat eating, intoxication. Once you may have an accidental fall down but second time we do the same then that  is not accidental, that means Krishna will or Maya will punish you, it will devour you and it will spank you left and right for long time and you will not know where I was and where I’m, you will be finished. So, accidental fall down means sometime we are uncontrolled and we blaspheme some devotee or become so much disturbed, angry and slap some devotee, that’s a big fall down but accidentally one time is accident, second time it is not accident. You see a beautiful, beautiful form of a woman, very attractive lady and then you just turn your face doing some other activity and second time you look at her that is definitely fall down because that will make you attach to the beautiful lady, ‘dhyayato vishayaan pumsaah’. So, accidental fall down means one time not repeated and that one time also it has to be really accidental.

If you become jealous of some devotee, it is a big big fall down not accidental or small, very big. Krishna will never forgive you, that’s a big fall down and for that fall down Krishna will not forgive you because just like you’re a mother and have a  small child and I offend your child by abusing words or slapping him and I say this is accidental fall down mother, please, excuse me, pardon me. Would she pardon me? Impossible, that is ‘Bhaktavatsala Krishna’. Krishna, whom the devotees are most dear, Krishna loves His devotees more than himself and you’re offending a devotee, he will never pardon that so this we cannot say it is accidental, it cannot be counted in accidental fall down, we should be very very careful because that will destroy our devotion to Krishna, it will destroy our relationship to Krishna and devotees. So, we have to be very careful.

 

सबसे बड़ा दुख क्या है?

सबसे बड़ा दुख क्या है?

हमारी कई-कई उत्क्रांती हुई तब हम कृष्ण भक्त बने, कितना कड़ा दुख झेलकर हम भक्त बने। ऐसा क्यों? क्योंकि वैष्णव खाली कृष्ण की सेवा करते है और गुरु की सेवा करते है, अगर वो गुरु वैष्णव है तो, और उनमें भी कई कई वैष्णव, कई कई प्रकार की उपासना करते है। तो, खाली कृष्ण की सेवा करना गलत है, लड्डू गोपाल की खाली सेवा करना गलत है| चैतन्य महाप्रभु क्या कहते है? आराध्यो भगवान् वृजेश तनया, वृजेश तनया, नन्द महाराज का बेटा। आराध्यो भगवान वृजेश तनया तद धाम वृन्दावनं। खाली कृष्ण नहीं, वृन्दावन के साथ, उनके भक्तों के साथ, राधारानी के साथ। गौडीय वैष्णव में राधा कृष्ण की अकेले की उपासना भी गलत है, अकेले कृष्ण की तो है ही। राधा कृष्ण की उपासना, पूज्य, इज्य, सेवा अकेले राधा कृष्ण की भी गलत है। गौर राधा कृष्ण, गौरांग महाप्रभु के साथ राधाकृष्ण की उपासना करनी चाहिए इसलिए गौडीय वैष्णव श्रेष्ठ है।कई अकेले आचार्यों की पूजा करते है खाली आचार्य या गुरु। परंपरा, आचार्य, प्रभुपाद की हम भी उपासना करते है, हर रोज़ पूजा करते है, श्री गुरु चरण पद्म, संसार दावानल इसलिए गौडीय वैष्णव श्रेष्ठ है।

ऐसा हमें पद मिला, सबसे श्रेष्ठ पदवी मिली तो इस पदवी में हमें हमारा कल्याण कर लेना चाहिए लेकिन वैष्णव अपराध से हम भक्ति में गिर जाते है, पुनः मुशिका भवः। पुनः मुशिका भवः प्रभुपादजी कहते है श्रेष्ठ पदवी पर हम आए, गौडीय वैष्णव सर्वश्रेष्ठ, इतनी ऊँची पदवी। बड़ो कृष्ण भक्त पद, कृष्ण भक्त का पद ओबामा से भी ऊपर कई कई गुणा, इंद्र से भी बड़ो भक्त पद, हम सबका पद सबसे ऊँचा है। सोचो की कहाँ है हम? और यह पद से हम गिर जाते है और रूचि खो देते है और स्थिरता आ जाती है, उत्साह कम हो जाता है। क्यों, ऐसा क्यों, ऐसा क्यों? एक ही कारण है साधुओं का अपराध, भक्तों, वैष्णवों का अपराध। इतने ऊँचे पद पर हम आ गए आखिरी मंजिल पर आ गए और वहाँ से गिरते है, पुनः मुशिका भवः। प्रभुपादजी कहते है एक चूहा था, मुशिका, चूहा साधू के पास जाता है और साधू को कहता है भगवन् मुझे बिल्ली बनादो, मुझे बिल्ली का बहुत डर रहता है, बिल्ली बनादो, तथास्तु। बिल्ली बन गया तो फिर से आया साधू के पास मुझे कुत्ता बनादो, मुझे कुत्ते का डर रहता है, कुत्ता बना दिया फिर से आया मुझे शेर बनोदो तो साधू ने तथास्तु, शेर बना दिया। तो बाद में साधू के साथ बैठता है तो साधू को घूरता है| साधू शेर को बोलता है क्या मुझे खान चाहते हो तो शेर बोलता है, हाँ। तो साधू कहता है पुनः मुशिका भवः फिर से  मुशिक, चूहा बनो, पुनः मुशिका भवः जैसा था वैसा हो जाओ तो हम उतनी ऊँची पदवी पर आए, भक्त, गौडीय वैष्णव भक्त सबसे ऊँची पदवी है, देवी-देवताओं से भी कई कई गुणा ऊँची पदवी। कम पुण्य हमें कृष्ण भक्त नहीं बनाते तो यह पद से गिरने का पुनः मुशिक बनने का कारण कितने है? दो नहीं? कितने कारण है? क्योंकि दूसरा का कोई भी अपराध होगा तो उससे बचने का उपाय है, हरि स्थाने अपराधे, नाम का अपराध, हरी का अपराध करोगे तो हरिनाम बचाएगा। चार अपराध है: सेवा अपराध, नाम अपराध, धाम अपराध, वैष्णव अपराध तो दूसरे सब अपराधों से आप बच जाओगे क्योंकि इलाज है। तुमः स्थाने अपराधे नाही परित्राण, कोई इलाज नहीं है, कोई भी इलाज नहीं इसका, इसलिए तो वैष्णव अपराधों से इतना बचना चाहिए, इतना डरना चाहिए कि हम शेर से न डरे, हम बिना प्रसाद के न डरे, कोठी बिना, सुख-दुखों से डरे नहीं लेकिन यह सबसे बड़ा दुख है।

चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय को प्रश्न पूछा की सबसे बड़ा दुख क्या है? क्या है सबसे बड़ा दुख? भक्तों का संग छूट जाए, साधू संग छूट जाए इससे बड़ा दुख कोई नहीं| सोचो मरने का दुख इतना बड़ा नहीं है, 84 लाख योनियों में चक्कर काटने का दुख इतना बड़ा नहीं, भूख का इतना बड़ा दुख, पैसों के बिना इतना दुख नहीं है, पत्नी के बिना दुख इतना नहीं है| तो सोचो यह वैष्णव, वैष्णव कृष्णा को कितने प्यारे है, कितनी प्यारे? कोई मूल्य है, कोई कह सकता है कितने प्यारे है? कोई सीमा नहीं है, उसकी सीमा नहीं है इतने प्यारे है|

ना तथा मे प्रियतमा आत्मा योनिर न शंकरो|

न च संकर्षणो न श्रीर नैवात्मा च यथा भवान||

हे उद्धव!, आप जैसे भक्त मुझे जितने प्यारे है उतना मेरा पुत्र ब्रह्मा मुझे इतन प्यारा नहीं है| ब्रह्मा कहाँ से पैदा हुए? भगवान से, ब्रह्मा भी इतना प्यारा नहीं जितना आप जैसे मेरे भक्त मुझे प्यारे है|  न शंकरो , मेरे प्राण शंकर भगवान, महादेव मुझे इतने प्यारे नहीं है| न च संकर्षणो अर्थात बलरामजी, बलराम संकर्षण है| न च संकर्षणो, मेरा भाई बलराम भी मुझे इतना प्यारा नहीं है जितने आप जैसे वैष्णव मुझे प्यारे है| न श्रीर,मेरी पत्नी श्रीलक्ष्मी, भाग्यश्री भी मुझे इतनी प्रिय नहीं है| नैवात्मा, मेरी आत्मा भगवान और भगवान की आत्मा में फर्क नहीं है फिर भी कहते है मेरी आत्मा भी मुझे इतनी प्यारी नहीं आपकी तरह|

वैष्णव कितने प्यारे है कृष्ण खुद को भी जितना प्यार नहीं करते उतना ज्यादा वैष्णवों से प्यार करते है| सोचो आपकी बाजू में जो वैष्णव बैठा है वो वैष्णव कृष्ण को कितना प्यारा है| ऐसा नहीं कि 60 मील दूर से वैष्णव आए तो वो वैष्णव है, वो सिद्ध है, ऐसा नहीं| आपकी बाजू में जो बैठे है वो वैष्णव कृष्ण को अतिशय प्यारे है|

ना तथा मे प्रियतमा आत्मा योनिर न शंकरो|

न च संकर्षणो न श्रीर नैवात्मा च यथा भवान||

भगवान कहते है जो मेरा भक्त है वो मेरा है, हाथी हो या मनुष्य जो मुझे भजते है वो मेरे भक्त है चाहे वो निकृष्ट हो| हम क्या कहते है, वो निकृष्ट भक्त है| नहीं, नहीं बहुत बड़ा अपराध हो जाएगा, भगवान के लिए न शुद्ध भक्त, न निकृष्ट भक्त, न उत्तम भक्त, माध्यम भक्त, भगवान के लिए सब भक्त है| माँ का एक बच्चा है मंद बुद्धि हो, लंगड़ा हो, काणा हो और एक बच्चा राजा हो तो वो  यह नहीं कहेगी हट यह मंद बच्चा है, और राजा को आओ आओ और मंद बच्चे को हट हट, तो भगवान के लिए निकृष्ट भक्त हो या शुद्ध भक्त हो, ऊँच नीच हो काई नव जहाणु मुणे भजे तो म्हारा रे| जो मुझे भजते है वो मेरे है और ऊँच नीच मैं नहीं जानता इसलिए निकृष्ट भक्त का भी आपने अपराध किया तो आपका सत्यानाश, आपकी भक्ति का सत्यानाश| इतनी ऊँची पदवी पर पहुंचकर हम पुनः मुशिक भवः, गिरते है ऐसा गिरते है ऐसा गिरते है, ऐसा गन्दी जगह कोई न हो जहाँ हम गिरते है| भक्तों का अपराध किसी को नहीं छोड़ता| क्यों नहीं छोड़ता? क्योंकि वैष्णव कनिष्ठ हो या उत्तम हो कृष्ण को अतिशय प्रिय है|

How to get back on track from falldown?

How to get back on track from falldown?

Krishna says at many places that my devotees may have some temporary fall down but they must be considered sadhus because in due course of time they come back on track.

Api cet su duracharo,

 bhajate maam anaya-bhaak saadhur eva sa mantavayah samyag vyavasito hi sah.

 Shipram bhavati dharmatma shashva chchantim nigachchati kaunteya pratijaanihi na me bhakta pranashyati.”

My devotee never perishes, maybe there is temporary fall down but ‘Shipram bhavati dharmatma’, he will again rejuvenate his transcendental devotional service unto me.

So, how to get back on track?

There are millions of ways to go back on track but the most important one is

“Sadhu sanga, naam kirtana, bhagavta srvana, Mathura vaas, sraddhaye sri murtir sevana, sakala sadhana sreshtha ei paancher anga Krsna bhakti janmaaye ei pancher alpa sanga.”

That means, the most important limbs of devotional service that can help you to come back to normal, where you left off is ‘sadhu sanga’– associating with saintly devotees, ‘naam kirtana– chanting of the holy name in a congregational kirtan or on japa beads, ‘Bhagavta srvana’– that one must read or hear Srimad bhagavatam, ‘Mathura vaas’– to reside in Vrindavan, Mathura, in a temple or at a devotees home, go to satsang and ‘sradhaaye srimurtir sevana’, with love, devotion and faith one must serve the deity form of Krishna. So, these five limbs of devotional service can put you quickly back on track. Out of all limbs of devotional service, these five are very important and even if you do very little of these five, they will enable you to reawaken your pure love for Krishna. Srila Rupa Goswami also gives shortcuts by saying,

utsaahat nischayad dhairyat tat-tat-karma pravartanaat,

 sanga tyaagat sato vrtteh sadbhir bhaktih prasidhyati.”

Utsah– enthusiasam, nischayad– strong determination, dhairyat– patience, tat-tat-karma pravartanaat– following the nine fold devotional service to Krishna which are Sravanam, kirtanam, visnu smaram, pada sevanam, arcanam, vandanam, dasyam, sakhyam and atma-nivedanam, ‘Sanga tyaagat’– abandoning the company of non-devotees, ‘sato vrtteh’– following the footsteps of devotees, pure devotees, Guru, Acaryas, Sadhus. These six things can put us back on track again. But, out of those, if you can associate with devotees, go to the temple, chant Hare Krishna 16 rounds and engage yourself into Kirtan- it is very important and dynamic way of getting back on track. Association of devotees is very very important, even Narada Muni, Srila Prabhupada and all such saints say that we also need to get the association of saintly people like us.