भाव हो या न हो, भाव से ही माला करनी चाहिए । लेकिन हमेशा तो वह भाव रहता नहीं है ,न आता है हमेशा। अगर आए तो बहुत अच्छा है । यही हम चाहते है कि नाम-जप के बाद हम रसास्वादन कर सकें, भाव। हमें भाव भक्ति चाहिए और बाद में प्रेम भक्ति। तो वो भाव भक्ति होगी साधना भक्ति ।

तीन प्रकार की भक्ति हैं – साधना भक्ति, भाव भक्ति और प्रेम भक्ति । साधना भक्ति इसलिए करते हैं कि हमें भाव भक्ति मिले, भाव भक्ति इसलिए करते हैं कि हमें प्रेम भक्ति मिले, प्रेमाभक्ति मिले। साधना भक्ति करनी चाहिए। साधन- हरे कृष्णा मंत्र ,कम से कम सोलह माला। भाव से ही नाम करना चाहिए ,लेकिन ऐसा नियम मत करो कि बस भाव से अगर एक माला हो तो फिर सोलह माला करने की ज़रुरत नहीं है, ऐसा नहीं। यह प्रभुपाद जी का नियम है कि कम से कम हमें सोलह माला करनी है, तो सोलह करनी है ,चाहे भाव हो या न हो । भाव हो तो बहुत अच्छा है और भाव के लिए ही तो माला करते हैं । नाम-जप हम इसलिए ही तो करते हैं कि हमारा प्रेम जाग्रत हो ।

हरे का अर्थ है, “हे राधारानी! मुझे श्रीकृष्ण की शुद्ध प्रेमाभक्ति प्रदान करें और उनकी सेवा प्रदान करें । आप सेवा माँग रहे हो, सेवा करोगे तो ही प्रेम पैदा होगा। उदहारण के लिए हम कुत्ते की सेवा करते है। जैसे कि कुत्ते की सेवा करोगे, कुत्ते को नहलाओगे, बाहर ले जाओगे , खिलाओगे ,तो कुत्ता किससे प्यार करेगा? आपसे । क्यों? क्योंकि मालिक सेवा कर रहा है। नौकर सेवा करेगा तो? है मालिक का कुत्ता, लेकिन नौकर उनकी सेवा करेगा तो , किससे प्यार करेगा? नौकर से? क्यों? क्योंकि वो सेवा कर रहा है ।

तो ” हरे कृष्णा महामंत्र सेवन मुखे ही जिह्वादो” ,यह मुँह से और जिह्वा से क्या है? श्रीकृष्ण की सेवा है । मुँह और जिह्वा से श्रीकृष्ण की सेवा हम करेंगे तो हमें क्या होगा? कृष्ण का प्रेम, भाव ह्रदय में जाग्रत होगा ।

तो यह मुँह और जिह्वा से श्रीकृष्ण की सेवा है और सेवा करने से ही उनका प्रेम हमारे हृदय में जाग्रत होगा। तो इसलिए भाव से अगर हो एक माला, तो बहुत अच्छा है ,सर्वश्रेष्ठ| लेकिन अगर भाव न भी हो तो सेवा करते रहो, मुँह से, जिह्वा से नाम की । तो वह सेवा से भी प्रेम और भाव जाग्रत होगा ।
कई बार लगता है कि हम नाम-जप मैकेनिकली करते हैं , कई बार लगता है लेकिन वो मैकेनिकली नहीं है । आप देखोगे तो वो माला करने वाला भक्त मैकेनिकली लगता है लेकिन थोड़ा सा कृष्ण के बारे में कुछ खराब सुनते ही भक्त को बुरा लगता है क्योंकि वो माला कर रहा है क्योंकि भाव अन्दर है। जैसे माता रसोई-घर में है और बच्चा सो रहा है तो इतना भाव नहीं आएगा। लेकिन जैसे ही वह रोने लगता है खान पान के लिए , तुरंत ही माता का प्रेम जाग्रत हो जाता है क्योंकि भाव अन्दर है, प्रेम अन्दर है। इसी तरह भाव अंदर है, प्रेम भी अंदर है और ऐसा लगता है कि माला मैकेनिकली हो रही है परन्तु होती भाव से है।
भगवान का नाम हमेशा नियम से ही करना चाहिए, प्रभुपाद जी का नियम है इसलिए हमें सोलह माला करनी ही चाहिए ,by hook or crook. There is no hook or crook because यह स्वाभाविक है, लेकिन हमें पहले hook or crook इसलिए लगता है कि जैसे हमारी जीभ का रस पीलिया से बिगड़ गया है। तो अगर हम उस समय मिठाई खाएंगे तो वो कड़वी लगती है जबकि मिठाई या मिश्री का गुण कड़वा नहीं है लेकिन बिमारी के कारण वो हमें कड़वा लगता है। तो जैसे हम मिठाई खाएँगे, मिश्री खाएंगे तो वह रोग मिटता जाएगा। तो बाद में वही मिठाई, मिश्री हमें मीठी लगेगी । मिश्री का गुण मिठास है तो जीभ उस मिठास को अनुभव करेगी।

इसी तरह भगवान का नाम मधुर है और हमारे अंदर भगवान का भाव है। तो जैसे हम नाम लेते रहेंगे, लेते रहेंगे , तो वो भाव जाग्रत होगा, प्रेम जाग्रत होगा और अंत में प्रेम ही बच जाएगा, प्रेम ही बच जाएगा ।